सफल राजनेता, फिल्म लेखक, गीतकार, साहित्यकार, कार्टूनिस्ट और पत्रकार मुथुवेल करुणानिधि का लंबी बीमारी के बाद मंगलवार को निधन हो गया । करुणानिधि, जिन्हें लोग प्यार से कलाइग्नर या कला का विद्वान कहा करते थे, पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे और द्रविड़ राजनीति में अन्नादुरई के बाद प्रमुख स्तंम्भ रहे ।करुणानिधि का जन्म तमिलनाडु के नागापट्टिनम ज़िले एक निम्नवर्गीय परिवार में 3 जून 1924 को हुआ था । करुणानिधि का राजनीति की तरफ आकर्षित होने का एक महत्वपूर्ण कारण जस्टिस पार्टी नेता अलागिरिसामी के भाषण रहे । 1940 के दशक की शुरुआत में करुणानिधि की मुलाक़ात उनके राजनैतिक गुरु सीएन अन्नादुरै से हुई । जब अन्नादुरै ने रामास्वामी पेरियार की पार्टी द्रविडार कझगम से अलग होकर द्रविड़ मुनेत्र कझगम बनाई तभी उनके साथ हो गए और जल्द विश्वास जीत लिया । महज़ 25 बरस की उम्र में करुणानिधि को पार्टी की प्रचार समिति में शामिल किया गया था ।इस बीच, करुणानिधि ने राजाकुमारी फ़िल्म से डायलॉग लिखने का काम शुरू किया । पराशक्ति, मलाईकल्लन, मनोहरा, अभिमन्यु, मंदिरी कुमारी, मरुद नाट्टू इलवरसी, मनामगन, देवकी और तिरुम्बिपार जैसी फ़िल्मों में करुणानिधि के लिखे डायलॉग्स ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई क्योंकि वो अपने डायलॉग्स में सामाजिक ताने बाने, अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरता, व्यवस्था पर चोट करते थे । 1947 से 2011 तक करीब 64 साल में करीब 75 पटकथा लेखन के दौरान उन्होंने कई यादगार फिल्में दी । इसके बाद करुणानिधि ने पत्रकारिता में हाथ आजमाया और मुरासोली नाम के अख़बार का प्रकाशन शुरू किया, जो कि बाद में डीएमके का मुखपत्र बना । मुरासोली में उन्होंने उडानपिराप्पे ( ओह! भाई…) नाम से सीरीज शुरू की, जो किसी भी अख़बार में सबसे लंबे समय तक चलने वाली सिरीज़ थी ।करुणानिधि ने 1957 में कुलिथलाई से अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा और विजयी होकर पहली बार विधायक बने । इसके बाद करुणानिधि कभी चुनाव नहीं हारे और लगातार 13 बार विधायक बने । करुणानिधि ने अपना आख़िरी चुनाव थिरुवारूर से 2016 में लड़ा । 1967 में उनकी पार्टी डीएमके ने राज्य की सत्ता हासिल की, जिसके बाद अन्नादुरै मुख्यमंत्री तो करुणानिधि लोक निर्माण और परिवहन मंत्री बने । मंत्री बनने के बाद उन्होंने सबसे पहला काम राज्य की सभी निजी बसों का राष्ट्रीयकरण कर प्रत्येक गांव को बस से जोडा । यह करुणानिधि की बड़ी उपलब्धि थी जिसके बाद इंदिरा गाँधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया ।1969 में सीएन अन्नादुरै की मौत के पश्चात वो मुख्यमंत्री बने । मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने ज़मीन को प्रति व्यक्ति 15 एकड़ तक सीमित कर दिया । इससे ज्यादा जमीन वालों को उस जमीन का हक़ छोड़ना पड़ा और किसानों को सिंचाई के लिए मुफ्त बिजली उपलब्ध करवाई । करुणानिधि पिछड़ों के विकास में आरक्षण को एक हथियार की तरह मानते थे इसलिये उन्होंने शिक्षा और नौकरी में पिछड़ी जातियों का आरक्षण 25% से बढ़ाकर 31% कर दिया । पिछड़ों में अति पिछड़ा वर्ग बनाकर उसे पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और जनजाति कोटे से अलग शिक्षा और नौकरियों में 20 फ़ीसदी आरक्षण दिया । इसके अतिरिक्त करुणानिधि ने महिला सशक्तिकरण में भी अतुलनीय योगदान दिया । करुणानिधि ने क़ानून बनाकर लड़कियों को पिता की संपत्ति में बराबर का हक़ दिया । साथ ही सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण भी दिया और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33 % आरक्षण लागू किया । करुणानिधि ने गरीबी उन्मूलन के लिये एक रुपए / किलो में चावल, मुफ़्त स्वास्थ्य बीमा योजना, दलितों को मुफ़्त घर देकर जनता के बीच प्रसिद्धि प्राप्त की ।करुणानिधि, जो नास्तिक थे, ने क़ानून बनाया जिसके बाद किसी भी जाति का व्यक्ति मंदिर का पुजारी बन सकता था । विद्यालयों में सुबह की प्रार्थना के समय गाये जाने वाले धार्मिक गीत की जगह तमिल नाटककार और कवि मनोनमानियम सुंदरानार की लिखी कविता को तमिल राजगीत बनाकर उसे अनिवार्य रूप से लागू किया । इसके अलावा उन्होंने ‘सामाथुवापुरम’ नाम से मॉडल हाउसिंग योजना की शुरूआत की जिसके तहत दलितों और स्वर्ण हिंदुओं को मुफ़्त में घर दिए गए, इस योजना का लाभ लेने वालों को सिर्फ एक शर्त का पालन करना होता था, जिसके अनुसार वो जाति के बंधन से आज़ाद होकर सवर्ण हिंदु और दलित के लिए अगल-बगल में बनाए घरों में रहना होगा । राज्य के मुख्यमंत्री रहते हुए तमिलनाडु को सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, व्यावसायिक रूप से विकसित राज्य बनाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा ।2016 के विधानसभा चुनाव में राज्य में सबसे ज्यादा अंतर से जीतने वाले विधायक बने । सन 2017 में गिरते स्वास्थ्य की वजह से अपनी राजनीतिक विरासत बेटे स्टालिन को सौंपकर राजनीति से सन्यास ले लिया । इसके बाद से ही बीमार रहने लगे । 94 वर्षीय करुणानिधि ने 7 अगस्त 2018 को कावेरी अस्पताल में शाम 6:10 बजे अंतिम सांस ली ।करुणानिधि द्रविड़ आंदोलन से जुड़े थे, इसलिये द्रविड़ राजनीति, जिसकी नींव ब्राह्मणवाद का खुला विरोध है, के प्रमुख नेता रहे करुणानिधि ने सदैव धार्मिक आडम्बरों का खुलकर विरोध किया । शायद भारत के उन इक्के दुक्के नेताओं में से है जिन्होंने सरेआम खुद को नास्तिक बताया । चूँकि द्रविड़ आंदोलन, हिंदू धर्म की किसी ब्राह्मणवादी परंपरा और रस्म में यक़ीन नहीं रखता है इसलिये जयललिता के समान इन्हें भी दफनाया जायेगा ।